सुहुमं व बादरं व जइ ण कहेज्ज विणएण सुगुरूणं ।
आलोचणाए दोसो एसो हु चउत्थओ होदि॥583॥
सूक्ष्म और बादर दोषों को विनय सहित गुरु से न कहे ।
तो यह चौथा आलोचन में बादर नामक दोष लगे॥583॥
अन्वयार्थ : सूक्ष्म दोष हो या बादर दोष हो, जो विनयपूर्वक अपने गुरुओं को नहीं कहते, उनके आलोचना का चतुर्थ दोष होता है ।

  सदासुखदासजी