
जह कंसियभिंगारो अंतो णीलमइलो बहिं चोक्खो ।
अंतो ससल्लदोसा तधिमा सल्लुद्धरणसोधी॥584॥
ज्यों काँसे का बर्तन नीला और मलिन हो भीतर से ।
किन्तु दिखे बाहर से उज्ज्वल त्यों सशल्य आलोचन है॥584॥
अन्वयार्थ : जैसे काँसे का भृंगार/झारी, वह अन्त: अर्थात् अभ्यंतर में तो नीली है, मलिन है और बाहर उज्ज्वल है । वैसे ही जो सूक्ष्म दोषों को छिपाकर स्थूल दोष कहते हैं, उनकी आत्मा मायाचार से अन्दर में तो मलिन है और बाह्य में व्रतादिकों की उज्ज्वलता से जगत को या आचार्यादिकों को दिखाने के लिये उज्ज्वल है । ऐसे शल्यसहित आलोचना करते हैं, उनकी बादर दोषसहित शल्योद्धरण शुद्धता जानना । ऐसा आलोचना का बादर नामक चौथा दोष कहा ।
सदासुखदासजी