इय जो दोसं लहुगं समालोचेदि गूहदे थूलं ।
भयमयमायाहिदओ जिणवयणपरंमुहो होदि॥586॥
एेसे सूक्ष्म दोष जो कहता, किन्तु छिपाए दोष स्थूल ।
भय-मद-मायासहित चित्त से, तो वह जिन-आगम प्रतिकूल॥586॥
अन्वयार्थ : मार्ग में बहुत गमन करने से चित्त में जो व्याकुलता हुई हो, उसके कारण ईर्यापथ के शोधने में कुछ असावधानी हुई हो तथा स्थान में, आसन में, शयन में, करवट उल्टीसीधी लेने में, मयूरपिच्छी से प्रमार्जन/शोधने में सावधानी न रही हो तथा किसी का शरीर जल से गीला हो गया हो, उसका स्पर्शन किया हो, सचित्त/गीली धूल पर शयन, आसन, स्थान किया हो, गर्भवती के द्वारा दिया गया भोजन लिया हो, बाल स्त्री के द्वारा दिया गया भोजन लिया हो - इत्यादि प्रमाद से उत्पन्न जो स्वल्प दोष, उनकी तो गुरुओं के पास जाकर आलोचना करे कि 'इससे हमारी महिमा होगी' - ऐसे-ऐसे सूक्ष्म दोषों की भी आलोचना करते हैं और महान बडे दोष व्रतों में, सम्यक्त्वादि में लगे हों, उन्हें बहुत बडे प्रायश्चित्त के भय से छिपाये तथा मद से छिपाये कि यदि ऐसे दोष कहेंगे तो हमारा उच्चपना घट जायेगा और स्वभाव से ही मायाचार करके छिपाये तो जिनेन्द्र के वचनों से पराङ्मुख होता है ।

  सदासुखदासजी