सुहुमं व बादरं वा जइ ण कहेज्ज विणएण स गुरूणं ।
आलोयणाए दोसो पंचमओ गुरुसयासे से॥587॥
विनयपूर्वक क्षपक कहे नहिं गुरु समक्ष बादर या सूक्ष्म ।
आलोचन यह, दोष पाँचवाँ माया शल्य रही भरपूर॥587॥
अन्वयार्थ : यदि भय, मद, माया छोडकर और सूक्ष्म दोष अथवा स्थूल दोष गुरुओं की समीपता होने पर भी स्वयं के गुरुओं को विनयसहित नहीं कहते हैं तो उनके सूक्ष्म नामक पाँचवाँ आलोचना का दोष होता/लगता है ।

  सदासुखदासजी