
रसपीदयं व कडयं अहवा कवडुक्कडं जहा कडयं ।
अहवा जदुपूरिदयं तधिमा सल्लुद्धरणसोधी॥588॥
यथा लौह या लाख कड़े के ऊपर किया स्वर्ण का लेप ।
अथवा स्वर्ण पत्र लोहे पर वैसे यह आलोचन शुद्धि॥588॥
अन्वयार्थ : जैसे किसी लोहे के या ताम्बे के कडे/कंकण के ऊपर किसी ने रस लगाकर पीला कर दिया और सोने के समान करके सुवर्ण कहकर दिखाया, अथवा ऊपर सोने का पत्ता लगाकर अन्दर ताम्बा भर दिया या जिसमें लाख भर दी हो - ऐसे कडे की कीमत नहीं मिलती । वैसे ही मायाचार सहित बडे दोषों को तो छिपाये और सूक्ष्म दोषों की आलोचना करे, उनका परमार्थ बिगड जाता है । उनके मायाचारसहित शल्योद्धरण शुद्धता जानना । ऐसा आलोचना का पाँचवाँ सूक्ष्म दोष कहा ।
सदासुखदासजी