+ अब आलोचना का छन्न नामक छठवाँ दोष छह गाथाओं द्वारा कहते हैं- -
जदि मूलगुणे उत्तरगुणे य कस्सइ विराहणा होज्ज ।
पढमे विदिए तदिए चउत्थए पंचमे च वदे॥589॥
यदि मूलगुण या उत्तरगुण में विराधना कोई करे ।
अथवा सत्य अहिंसादिक व्रत में कोई अतिचार लगे॥589॥

  सदासुखदासजी