को तस्स दिज्जइ तवो केण उवाएण वा हवदि सुद्धो ।
इय पच्छण्णं पुच्छदि पायच्छित्तं करिस्सत्ति॥590॥
उसे कौन-सा तप प्रदेय है कैसे वह होता है शुद्ध ।
मैं इसका प्रायश्चित्त लूँगा - यह विचार पूछे प्रच्छन्न॥590॥

  सदासुखदासजी