
इय पच्छण्णं पुच्छिय साधू जो कुणइ अप्पणो सुद्धिं ।
तो सो जिणेहिं वुत्तो छट्ठो आलोयणा दोसो॥591॥
इसप्रकार प्रच्छन्न पूछकर जो करता है अपनी शुद्धि ।
उसे दोष छठवाँ आलोचन होता - यह जिनदेव कहें॥591॥
अन्वयार्थ : किसी साधु को दोष लगा हो, तब अपने परिणामों में विचार करें कि गुरुओं से इसप्रकार पूछकर प्रायश्चित्त करूँगा, उसके छन्न दोष होता/लगता है । क्या पूछे? यह कहते हैं । हे स्वामिन्! कोई साधु के मूलगुण में दोष लगा हो तथा उत्तरगुणों में लगा हो, उसकी शुद्धता कैसे होती है? जिसे अहिंसाव्रत में दोष लगा हो, सत्यव्रत में, अचौर्यव्रत में, ब्रह्मचर्यव्रत में, परिग्रहत्याग में जो अतिचार लगे हों तो उसकी शुद्धता कैसे होती है? उसे कौन-सा तप देते हैं? किस उपाय से शुद्धता होती है? ऐसे पूछेगा, उसके बीच में ही मेरा दोष भी पूछ लूँगा और जो प्रायश्चित्त कहेंगे, वह प्रायश्चित्त कर लूँगा । ऐसा विचार करके और प्रच्छन्न रूप से गुरुओं से पूछ करके जो अपनी शुद्धता करता है, उसे जिनेन्द्र भगवान ने आलोचना का छन्न नामक छठवाँ दोष कहा है ।
सदासुखदासजी