
तवसंजमम्मि अण्णेण कदे जदि सुग्गदिं लहदि अण्णो ।
तो परववदेसकदा सोधी सोधिज्ज अण्णंपि॥593॥
यदि किसी के तप संयम करने पर सुगति अन्य की हो ।
तो ही अन्य नाम के प्रायश्चित्त से शुद्धि अन्य की हो॥593॥
अन्वयार्थ : तप-संयम तो दूसरा करे और शुभगति अन्य पाये तो पर के व्यपदेश से की गई आलोचना अन्य को शुद्ध करे । ऐसा तो कभी भी होता नहीं । जो दूसरों के नाम से अपनी शुद्धता करना चाहे, वह क्या करता है?
सदासुखदासजी