
मयतण्हादो उदयं इच्छइ चंदपरिवेसणा कूरं ।
जो सो इच्छइ सोधी अकहंतो अप्पणो दोसे॥594॥
अपना दोष न कहकर भी यदि क्षपक शुद्धि अपनी चाहे ।
वह चाहे मरीचिका से जल चाहे भोजन, चन्द्र प्रवेश1॥594॥
अन्वयार्थ : जो गुरुओं से अपना दोष तो नहीं कहते और अपनी शुद्धता चाहते हैं, वे क्या करते हैं? मृगतृष्णा से जल चाहते हैं और चन्द्रमा के कुण्डाला/चन्द्रबिम्ब2 से भोजन/अन्न चाहते हैं । ऐसा आलोचना के छन्न नामक छठवें दोष का वर्णन किया ।
सदासुखदासजी