
तो दोसे कहेइ सगुरूणं ।
आलोचणाए दोसो सत्तमओ सो गुरुसयासे॥596॥
स्पष्ट सुनाई दे न गुरु को इसप्रकार यदि दोष कहे ।
तो गुरु निकट सातवाँ शब्दाकुलित नाम का दोष लगे॥596॥
अन्वयार्थ : जिस समय पक्ष का प्रतिक्रमण, चातुर्मासिक प्रतिक्रमण, एक वर्ष संबंधी सांवत्सरिक प्रतिक्रमण करके अपने-अपने पक्ष के, चार माह के या एक वर्ष पर्यंत के लगे दोषों की शुद्धता करते समय संघ के सम्पूर्ण मुनीश्वर प्रतिक्रमण करने के लिये गुरुओं के समीप इकट्ठे होकर प्रतिक्रमण पाठ पढ रहे हों, उस समय कोई मुनि अपना दोष भी यथेच्छ अपने गुरुओं को जैसे यथावत् प्रगट हो, वैसे सुनाये, उसको अव्यक्त नामक आलोचना का सातवाँ दोष लगता है ।
सदासुखदासजी