अरहट्टघडीसरिसी अहवा चुंदछुदोवमा होइ ।
भिण्णघडसरिच्छा वा इमा हु सल्लुद्धरणसोधी॥597॥
रहट चटीवत्1 तथा मथानी की रस्सीवत् आलोचन ।
फूटे घट में जल भरते-सम निष्फल है यह शुद्धिकरण॥597॥
अन्वयार्थ : जैसे अरहट की घडी एक तरफ खाली होती जाती है और दूसरी तरफ बहुत भारी हो जाती है तथा दही की मथानी में रई की डोरी एक ओर खुलती है और दूसरी ओर बँधती/लिपटती जाती है एवं फू टे घडे में एक तरफ से जल भरते हैं और दूसरी तरफ से निकल जाता है, तैसे ही एक तरफ से आलोचना करते हैं और दूसरी तरफ से मायाचार करके कर्म का बंध करते हैं - ऐसी यह शब्दाकुलित दोष सहित शल्योद्धरण शुद्धता है । ऐसा शब्दाकुलित नामक आलोचना का सप्तम दोष कहा ।

  सदासुखदासजी