+ अब बहुजन नामक दोष पाँच गाथाओं द्वारा कहते हैं - -
आयरियपादमूले हु उवगदो वंदिऊण तिविहेण ।
कोई आलोचेज्ज हु सव्वे दोसे जहावत्ते॥598॥
तो दंसणचरणाधारएहिं सुत्तत्थमुव्वहंतेहिं ।
पवयणकुसलेहिं जहारिहं तवो तेहिं से दिण्णो॥599॥
णवमम्मि य जं पुव्वे भणिदं कप्पे तहेव ववहारो ।
अंगेसु सेसएसु य पइण्णए चावि तं दिण्णं॥600॥
तेसिं असद्दहंतो आइरियाणं पुणो वि अण्णाणं ।
जइ पुच्छइ सो आलोयणाए दोसो हु अट्ठमओ॥601॥
गुरु के चरणकमल में जाकर मन-वच-तन से नमन करे ।
मन-वच-तन कृत-कारित-मोदनगत अपने सब दोष कहे॥598॥
तब दर्शन-चारित धारक सूत्रार्थ वहन करनेवाले ।
प्रवचन कुशल1 गणी ने उसको यथा-दोष प्रायश्चित्त दें॥599॥
प्रत्याख्यान पूर्वगत अथवा कल्प और व्यवहार सु-अंग ।
अंग प्रकीर्णक के अनुसार गणी उसको प्रायश्चित दें॥600॥
किन्तु क्षपक, गुरु के वचनों पर करे नहीं श्रद्धान अरे!
और दूसरे आचायाब से पूछे-अष्टम दोष खरे॥601॥
अन्वयार्थ : कोई मुनि आचार्य के चरणारविंदों की मन, वचन, काय से वंदना करके जैसे अपने को दोष लगे हों, तैसे ही सर्व दोषों की आलोचना करें, तब दर्शन-चारित्र के धारक और सूत्र के अर्थ को धारण करनेवाले तथा प्रायश्चित्त में प्रवीण ऐसे आचार्य ने उनको यथायोग्य तप दिया । कैसा तप दिया? जो नौवाँ प्रत्याख्यान नामक पूर्व में कहा तथा कल्पव्यवहारसूत्र में कहा एवं अन्य अंग-प्रकीर्णक में जो भगवान ने कहा, वैसा प्रायश्चित्त शिष्य को दिया । उन-उन प्रायश्चित्त देने वाले गुरुओं पर विश्वास नहीं करके दूसरे-दूसरे आचार्य गुरुओं से पूछते हैं - कि इस अपराध का क्या प्रायश्चित्त है? वह बहुजन नामक आलोचना का अष्टम दोष है ।

  सदासुखदासजी