पगुणो वणो ससल्लं जध पच्छा आदुरं ण तावेदि ।
बहुवेदणाहिं बहुसो तधिमा सल्लुद्धरणसोधी॥602॥
भीतर में हो कील किन्तु ऊपर से अच्छा दिखता घाव ।
बहुत कष्ट क्या नहिं देता है? शल्य शुद्धि यह वैसा घाव॥602॥
अन्वयार्थ : जैसे शल्य सहित सीधा बाण भी शरीर में लगा हो, क्या वह आतुर व्यक्ति को संतापित नहीं करता? अपितु करता ही करता है । बहुत वेदना से बहुत संतापित करता है । तैसे ही बहुत जनों से अपने दोष का पूछना परिणामों को बहुत दूषित करता है । वैसे ही बहुजन नामक आलोचना का दोष भी आत्मा को संतापित करता है । ऐसा बहुजन नामक दोष कहा ।

  सदासुखदासजी