आलोचिदं असेसं सव्वं एदं मएत्ति जाणादि ।
बालस्सलोचेंतो णवमो आलोचणा दोसो॥604॥
निरवशेष सब दोष कहे हैं मैंने - वह एेसा जाने ।
बाल मुनि से दोष कथन नवमा आलोचन दोष कहें॥604॥
अन्वयार्थ : संघ में कोई आगम/शास्त्र के ज्ञान से रहित हो तथा अवस्था से अथवा चारित्र से बाल हो - अज्ञानी हो, उसके पास अपने व्रतों में लगे दोष कहकर और कोई अज्ञानी मुनि ऐसा माने "कि मैंने सर्व दोषों की आलोचना की" - ऐसे अज्ञानी से आलोचना करनेवाले के अव्यक्त नामक नववाँ आलोचना का दोष लगता है ।

  सदासुखदासजी