+ सो यह आलोचना कैसी है, उसका दृष्टान्त कहते हैं - -
कूडहिरण्णं जह णिच्छएण दुज्जणकदा जहा मेत्ती ।
पच्छा होदि अपत्थं तधिमा सल्लुद्धरणसोधी॥605॥
चोरी का धन क्रय करना अरु दुर्जन से मैत्री करना ।
पीछे होती हानिकारक वैसे यह शुद्धि करना॥605॥
अन्वयार्थ : जैसे कपट का सोना या धन और दुर्जन की मित्रता निश्चय से पश्चात् परिपाक काल में अपथ्य रूप होती है, तैसे ही यह शल्योद्धरण शुद्धता जानना । ऐसे आलोचना का अव्यक्त नामक नववाँ दोष कहा ।

  सदासुखदासजी