
सो दस वि तदो दोसे भयमायामोसमाणलज्जाओ ।
णिज्जूहिय संसुद्धो करेदि आलोयणं विधिणा॥611॥
अतः क्षपक भय-माया-मृषा-मान-लज्जा एवं दस दोष ।
तजकर सम्यक् विधि से होकर शुद्ध करे आलोचन दोष1॥611॥
अन्वयार्थ : इसलिए क्षपक इन दस दोषों को त्याग कर तथा भय, मायाचार, असत्य, अभिमान, लज्जा - इनको त्याग कर और दोषरहित शुद्ध होकर विधिपूर्वक आलोचना करें ।
सदासुखदासजी