
णट्टचलवलियगिहिभासमूगदद्दुरसरं च मोत्तूण ।
आलोचेदि विणीदो सम्मं गुरुणो अहिमुहत्थो॥612॥
हाथ नचाना भाैं मटकाना गात्र चलन1 गृहि वचन2 तजे ।
घर्घर स्वर तज गुरु समक्ष होकर विनम्र निज दोष कहे॥612॥
अन्वयार्थ : हस्त को नचाना/हिलाना-डुलाना, भृकुटी का विक्षेप करना/आँखों का मटकाना, शरीर को बलपूर्वक वक्र करना/आडा-टेडा करना, गूँगे की भाँति इशारा करना, समस्या को बताने के लिये हूँ हूँकार करना, गृहस्थों के समान असंयमरूप वचन बोलना, घर्घरस्वर से बोलना, दर्दुर/मेंढक की तरह उद्धत होकर शब्द को दबाकर बोलना - इत्यादि वचन के दोषों को त्यागकर और अंजुली जोडकर, मस्तक झुकाकर महाविनययुक्त होकर गुरुओं के सन्मुख जाकर आलोचना करना तथा अति शीघ्रता से नहीं करना और न अतिबिलंब से करना, स्पष्ट आलोचना करना ।
सदासुखदासजी