
पुढविदगागणिपवणे य बीयपत्तेयणंतकाए य ।
विगतिगचदुपंचिदियसत्तारम्भे अणेयविहे॥613॥
पिंडोवधिसेज्जाए गिहिमत्तणिसेज्जवाकुसे लिंगे ।
तेणिक्कराइभत्ते मेहूणपरिग्गहे मोसे॥614॥
णाणे दंसणतववीरिये य मणवयणकायजोगेहिं ।
कदकारिदेणुमोदे आदपरपओगकरणे य॥615॥
अद्धाण रोहगे जणवए य रादो दिवा सिवे ऊमे ।
दप्पादिसमावण्णे उद्धरदि कमं अभिंदंतो॥616॥
दप्पपमादआणाभोगआपगा आदुरे य तित्तिणिदा ।
संकिदसहसाकारे य भयपदोसे य मीमंसं॥617॥
अण्णाणणेहगारव अणप्पवसअलस उपधि सुमिणंते ।
पलिकुंचणं संसोधी करेंति वीसंतवे भेदे॥618॥
इय पयविभागियाए व ओधियाए व सल्लमुद्धरियं ।
सव्वगुणसोधिकखी गुरूवएसं समायरइ॥619॥
पृथ्वी-जल-अग्नि-वायु अरु वनस्पति द्वय भेद सहित ।
द्वि त्रि चउ पंचेन्द्रिय जीवों संबंधी आरम्भ अनेक॥613॥
पिण्ड-उपधि-आसन-ममत्व अरु तन-प्रक्षालन लिंगविकार ।
पर-धन निशि-भोजन-वांछा मैथुन-परिग्रह अरु मृषाविकार॥614॥
श्रद्धा-ज्ञान वीर्य तप में जो मन-वच-तन से हुए विकार ।
निज से अथवा पर से कृत-कारित-अनुमोदन से अतिचार॥615॥
मद, प्रमाद या मार्ग निरोध-रु दिवस रात्रि अरु सपने में ।
दोष लगे जो उन सबको वह गुरु समीप क्रम से कह दे॥616॥
दर्प प्रमाद-रु अनाभोग आपात आर्त्तता तित्तिणदा1 ।
शंकित सहसा भय प्रदोष मीमांसा अरु अज्ञान स्नेह॥617॥
गौरव, परवश, स्वाध्याय में आलस उपधि और स्वप्नान्त ।
पलिकुंचन2 अरु स्वयं शुद्धि ये बीस भेद अतिचार सुजान॥618॥
आलोचन सामान्य विशेष करे अरु माया शल्य तजे ।
सब गुण शुद्धि वांछक गुरुवर कथित तपों को ग्रहण करे॥619॥
अन्वयार्थ : मृत्तिका, पाषाण, पर्वतों की छनी बालू-रेत, लवण, अभ्रक इत्यादि अनेक प्रकार की पृथ्वी का खोदना, कुचलना, जलाना, कूटना, फोडना - इत्यादि पृथ्वी की विराधना संबंधी कोई दोष लगे हों । जल, पाला/ओस का जल, गह्ने, नदी, तालाब, वर्षादि से उत्पन्न जो जल, उन्हें पीने से, स्नान करने से, अवगाहन/प्रवेश करने से, तैरने से, मर्दन करने से, हस्त-पादादि से बिलोने से जलकाय की विराधना होती है - इनकी विराधना संबंधी कोई दोष लगा हो । अग्नि, ज्वाला, प्रदीप, अंगार इत्यादि अग्निकाय के जीव, उन पर जल डालना तथा पाषाण, मिट्टी, बालू इत्यादि से दबाना, काष्ठादि के द्वारा कूटना, बिखेरना इत्यादि से अग्निकायिक जीवों की विराधना होती है - इनकी विराधना संबंधी कोई दोष लगे हों ।
तथा झंझा/तेज पवन, मंडलीक/बबूला, पंखे की हवा इत्यादि जो पवन, उनमें प्रवृत्ति करने से जो दोष लगे हों । वनस्पति में प्रत्येक, साधारण, बीज, फल, पत्र, पुष्पादि का छेदन, मर्दन, भंजन, स्पर्शन, भक्षण इत्यादि के द्वारा विराधना होती है - इनकी विराधना संबंधी कोई दोष लगे हों तथा द्वीन्द्रियादि त्रस जीवों के मारन, ताडन, छेदन, बन्धन इत्यादि से कोई दोष लगे हों और पिंड/भोजन करने में कोई दोष, मल, अंतराय से लगे हों । अयोग्य उपकरण ग्रहण करने से दोष लगे हों । सेज्जा/वसतिका सदोष ग्रहण की हो । गृहस्थों के भाजन/पात्र मिट्टी के, काँसे, पीतल, ताम्बे, सुवर्ण, चाँदीमय उनमें राग-द्वेष होने से तथा पतनादि/गिर जाने आदि से दोष लगे हों । गृहस्थों के योग्य पीठ, फलक, चौकी, पाटा, खाट, पर्यंक, सिंहासनादिक में बैठने-स्पर्शने से दोष लगे हों । कुश/स्नान, उद्वर्तन देहप्रक्षालनादि से दोष लगे हों । लिंग विकासन विकारादि से दोष लगे हों । पर के धन को ग्रहण करने की इच्छा से दोष लगे हों ।
तथा रात्रिभोजन में रागसहित चिंतवनादि से दोष लगे हों । स्त्रियों के अवलोकनादि से ब्रह्मचर्य के घातादि से दोष लगे हों । परिग्रह का चिंतवन करने से तथा झूठ वचन बोलने से दोष लगे हों । तथा ज्ञान, दर्शन, तप, वीर्य में मन-वचन-काय, कृत-कारित-अनुमोदना से दोष लगे हों । अपने और पर के प्रयोग से दोष लगे हों कि "इस सम्यग्ज्ञान से क्या साध्य है? स्वर्ग-मोक्ष का देनेवाला तो सम्यक्चारित्र ही है, अत: उस चारित्र का ही आचरण करने योग्य है, इसप्रकार मन से ज्ञान की अवज्ञा की हो ।" तथा सम्यग्ज्ञान को मिथ्या कह देना, ऐसी वचन से अवज्ञा की हो, सम्यग्ज्ञान का कथन करने में मुख की विवर्णता से/बिगाडने से अपनी अरुचि का प्रकाशन तथा मस्तक हिलाकर 'ऐसा नहीं' - इत्यादि रूप से ज्ञान की अवज्ञा की हो तथा अविनयादि किया हो ।
तथा दर्शन में शंकादि दोष लगाये हों । तप का अनादर किया हो "कि तप करने में क्या है? आत्मविशुद्धता ही कल्याणकारी है" तथा वीर्य/सामर्थ्य को छिपाना, परीषह सहने में कायरता से मन-वचन-काय, कृत-कारित-अनुमोदनादि से अपने से ही या शिथिलाचारियों की संगति से जो दोष लगे हों । किसी देश में परचक्र के उपद्रव से मार्ग रुक गया हो, निकलने में असमर्थ हों, संक्लेशरूप भिक्षा ग्रहण की हो, अयोग्य वस्तु का सेवन किया हो, रात्रि में कोई अतिचार लगे हों तथा दर्पादि से दोष लगे हों । उन सबके अनुक्रम का उल्लंघन नहीं करनेवाले क्षपक, वे गुरुओं के समीप विनयसहित प्रगट करते हैं ।
ऐसा पदविभागिकया/विस्ताररूप आलोचना करके तथा ओधिकया/संक्षेप में आलोचना करके उसके अन्तर्गत मायाशल्य को उखाड कर सर्व दर्शन-ज्ञान-चारित्र तथा मूलगुण, उत्तरगुणों की शुद्धता का इच्छुक जो क्षपक, वह गुरुओं का दिया प्रायश्चित्त ग्रहण करता है ।
1. रस और बकवाद में आसक्ति रखना 2. अतिचारों की अन्य रीति से कहना विशेष - 617 एवं 618 गाथा पण्डित सदासुखदासजी की स्वयं की हस्तलिखित प्रीति में नहीं है । अत: उसमें इनका अर्थ भी नहीं है । ये गाथायें छपी हुई पुस्तक में हैं । इनमें एतचारों के 20 भेद बताए हैं - 1. दर्प, 2. प्रमाद, 3. अनाभोग, 4. आपात, 5. अर्तता, 6. तित्तिणदा, 7. शंकित, 8. सहसा, 9. भय, 10 . प्रदोष, 11. मीमांसा, 12. अज्ञान, 13. स्नेह, 14. ऋद्ध्यादि गौरव, 15. पखश, 16. स्वाध्याय में आलस्य, 17. उपधि , 18. स्वप्नांत, 19. पलिकुंचन और 20. स्वयंशुद्धि । इनका विशद वर्णन छपी हुई मूलाराधना से जानना चाहिए ।
सदासुखदासजी