+ उसमें इनका अर्थ भी नहीं है । ये गाथायें छपी हुई पुस्तक में हैं । इनमें अतिचारों के 20 भेद बताये हैं - -
कदपावो वि मणुस्सो आलोयणणिंदओ1 गुरुसयासे ।
होदि अचिरेण लहुओ उरुहिय2भारोव्व भारवहो॥620॥
पापी नर भी गुरु समीप आलोचन या निन्दा करके ।
हल्का हो जाता तुरन्त ज्यों भार उतारे भारवहक3॥620॥
अन्वयार्थ : जैसे कोई बहुत भार वहन/ढोनेवाला पुरुष अपने शरीर से भार उतारकर तत्काल ही अत्यन्त हलका हो जाता है, सुखी होता है, निर्भार हो जाता है; वैसे ही पहले किये असंयमादि द्वारा पाप जिसने, ऐसा पाप करनेवाला मनुष्य भी गुरुओं के समीप अपने दोष प्रगट करके शीघ्र ही पाप के भार से रहित, हलका हो जाता है ।

  सदासुखदासजी