
सुबहुस्सुदा विसंता जे मूढा सीलसंजमगुणेसु ।
ण उवेंति भावसुद्धिं ते दुक्खणिहेलणा होंति॥621॥
बहुश्रुत होेने पर भी संयम शील-गुणों में जो मुनिमूढ़ ।
भाव शुद्धि नहिं रखते वे अति दुःखों से पीड़ित होते॥621॥
अन्वयार्थ : जो बहुत शास्त्रों का पारगामी भी है और शील, संयम, व्रत, मूलगुणादि में भावों की शुद्धता नहीं है, वह मोही मूढ संसार में अनेक दु:खों को प्राप्त होता है, तिरस्कार को प्राप्त होता है ।
सदासुखदासजी