
आलोयणं सुणित्ता तिक्खुत्तो भिक्खुणो उवायेण ।
जदि उज्जुगोत्ति णिज्जइ जहाकदं पट्ठवेदव्वं॥622॥
सुनकर आलोचना श्री गुरु मुनि से तीन बार पूछें ।
सरल हृदय जानें यदि उसको यथायोग्य प्रायश्चित्त दें॥622॥
अन्वयार्थ : क्षपक की आलोचना श्रवण करके अन्य उपाय से तीन बार पूछकर यदि सरलभावरूप जाने कि आलोचना मायाचार रहित सरल परिणामों से की गई है - ऐसा जान लेवें, तब 'जैसे किये पापों की विशुद्धता हो जाये, वैसा' प्रायश्चित्त देकर शुद्धता में स्थित करना योग्य है ।
सदासुखदासजी