आदुरसल्ले मोसे मालागरराय कज्ज तिक्खुत्तो ।
आलोयणाए वक्काए उज्जुगाए य आहरणे॥623॥
राज-कार्य, व्यापारी रोगी चोरी में पूछें त्रय बार ।
वैसे आलोचन में पूछें, सरल-वक्र का यह दृष्टान्त॥623॥
अन्वयार्थ : जैसे आतुर/रोगी से वैद्य तीन बार पूछा करते हैं - 'भो भद्रपरिणामी! तुमने क्या भोजन किया है? कैसा आचरण किया है? तथा तुम्हारे रोग की प्रवृत्ति किस प्रकार की है? वेदना कैसीकै सी होती है? यह सरल परिणाम से सत्य कहो ।' ऐसे तीन बार पूछने के बाद उसके रोग की उत्पत्ति का, रोग का इलाज कराने के परिणाम जाने जाते हैं । शरीर में कोई शल्य लगी हो, उसको भी तीन बार पूछते हैं कि - 'तुम्हें शल्य किस जगह लगी है? कैसी वेदना होती है? किस कारण से हुई है? उस शल्य को तीन बार पूछते हैं, सँभालते हैं/देखते हैं कि शल्य कहाँ लगी है? ऐसे स्थान का निर्णय हो जाये, तब निकालने का उपाय होता है/करते हैं ।
किसी वचन की सत्यता-असत्यता का निर्णय करना हो, वहाँ भी समय पाकर तीन बार पूछते हैं । वस्तु का मोल/कीमत भी तीन बार पूछी जाती है । विषभक्षण किया हो तो भी तीन बार पूछना योग्य है । राजा की आज्ञा भी तीन बार पूछते हैं - हे स्वामिन्! आपने इस कार्य को करने की आज्ञा की, सो ऐसा ही करना, आपके अवलोकन में, विचार में आ गया या कैसे? इसप्रकार राजा के बडे या छोटे कार्य के संबंध में तीन बार पूछने का मार्ग है । उसीप्रकार आलोचना की सरलता-वक्रता के संबंध में भी यह दृष्टान्त तीन बार पूछने का है ।

  सदासुखदासजी