
एत्थ दु उज्जुगभावा ववहरिदव्वा भवंति ते पुरिसा ।
संका परिहरिदव्वा सो से पट्ठाहि जहि विसुद्धा॥625॥
प्रतिसेवन अतिचार यदि मुनि कहते हैं क्रम के अनुसार ।
गुरुवर उसकी शुद्धि करते जानें जो आगम व्यवहार॥625॥
अन्वयार्थ : प्रतिसेवा जो द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव से व्रतों में विराधना द्वारा दोष लगे हों, उन समस्त दोषों को यथाक्रम से नहीं कहते तो आगमव्यवहारी जो प्रायश्चित्त को जाननेवाले आचार्य, उस क्षपक को शुद्ध नहीं करते ।
सदासुखदासजी