
पडिसेवणादिचारे जदि आजंपदि जहाकमं सव्वे ।
कुव्वंति तहो सोधिं आगमववहारिणो तस्स॥626॥
इसीलिए जो क्षपक मुनि करते हैं सरल भाव व्यवहार ।
प्रस्थापित होते विशुद्धि में शंका का करके परिहार॥626॥
अन्वयार्थ : जो व्रतों की विराधना के सभी अतिचारों की यथाक्रम से आलोचना करते हैं तो आगमव्यवहार को जाननेवाले आचार्य भी क्षपक को प्रायश्चित्त देकर शुद्ध करते हैं ।
सदासुखदासजी