
सम्मं खवएणालोचिदम्मि छेदसुदजाणग गणी से ।
तो आगममीमंसं करेदि सुत्ते य अत्थे य॥627॥
सम्यक् आलोचना करे मुनि तो प्रायश्चित्त श्रुत ज्ञाता ।
सूत्र-अर्थ से आगम द्वारा करते उसकी मीमांसा॥627॥
अन्वयार्थ : क्षपक/मुनि, वे यदि सम्यक् आलोचना करते हैं तो प्रायश्चित्तसूत्र के ज्ञाता जो आचार्य, वे सूत्र से, अर्थ से, आगम से विचार करके "कि ऐसे अपराध का ऐसा प्रायश्चित्त देना, सो जैसे परिणामों से जैसा दोष लगाया हो, वैसा प्रायश्चित्त देना तथा अब इस मुनि के परिणाम दोष से अति भयभीत हैं या मन्द भयवान हैं?" यही विचार कर ऐसा प्रायश्चित्त देवें कि आगामी काल में दोष लगने के मार्ग में प्रवर्तन ही नहीं करे । तथा प्रायश्चित्त लेना भी उसका ही सफल है, जो अपने हजार खंड/टुकडे भी हो जायें तो भी पुन: उन दोषों को नहीं लगाये और जिसका पहले से ही ऐसा अभिप्राय है कि दोष लग जायेगा तो फिर प्रायश्चित्त ग्रहण कर लूँगा ।" - ऐसे खोटे अभिप्रायवाले के कदापि शुद्धता नहीं होती ।
सदासुखदासजी