पडिसेवादो हाणी वड्ढी वा होइ पावकम्मस्स ।
परिणामेण दु जीवस्स तत्थ तिव्वा व मंदा वा॥628॥
प्रतिसेवन से पाप-कर्म की हानि-वृद्धि होती है ।
जीवों के परिणामों के अनुसार मन्द या तीव्र रहे॥628॥
अन्वयार्थ : प्रतिसेवा/व्रतों की विराधना, उससे उत्पन्न जो पापकर्म, उसकी किसी मुनि के तो पश्चात्तापादि रूप परिणाम, उससे तीव्रहानि या मन्दहानि विशुद्धता के प्रभाव से होती है कि हाय! यह बडा अनर्थ है । मैं पापी, कैसा अनर्थ किया, जो ऐसे व्रतों को मलिन किया । इसप्रकार बारंबार अपने को निन्दता हुआ व्रतों की उज्ज्वलता की इच्छा करनेवाला पुरुष पापकर्म की बहुत निर्जरा या अल्प निर्जरा, परिणामों के अनुसार करता है और कोई साधु व्रतोंे में दोष लगाकर प्रमादी बना रहता है, क्या हमने ही दोष लगाये हैं? प्रायश्चित्त ले लेंगे, सबके ही दोष लगते हैं । या दोष किया, उसमें किंचित् राग करते हैं, उनके मलिन परिणामों से पापकर्म की बहुत वृद्धि या थोडी वृद्धि होती है ।

  सदासुखदासजी