सावज्जसंकिलिट्ठो गालेइ गुणे णवं च आदियदि ।
पुव्वकदं व दढं सो दुग्गदिभवबंधणं कुणदि॥629॥
संक्लिष्ट सावद्य मुनि गुण-नाश करे नव-बन्ध करे ।
पूर्वकर्म दृढ़ करे और दुर्गतियों का भव-बन्ध करे॥629॥
अन्वयार्थ : कोई मुनि दोष लगाकर भी बहुत पापकर्म से संक्लेशरूप होकर अपने गुणों का नाश करता है और नवीन कर्मबंध करता है तथा पूर्व में किये कर्म को ऐसा दृढ करता है कि जो दुर्गति में भय और बंधन को करता/प्राप्त होता है ।

  सदासुखदासजी