पडिसेवित्ता कोई पच्छत्तावेण डज्झमाणमणो ।
संवेगजणिदकरणो देसं घाएज्ज सव्वं वा॥630॥
कोई असंयम मन में पश्चात्ताप भाव से दग्ध रहे ।
एकदेश या सर्वदेश घाते संवेगी भावों से॥630॥
अन्वयार्थ : कोई मुनि संयम में दोष लगाकर पश्चात्ताप से दग्ध होता है मन जिनका कि 'हाय ! मैं पापी, मैंने बहुत निंद्य कर्म किया । अब संसार में डूब जाऊँगा । मेरा सहाई कोई दूसरा नहीं है ।' ऐसे संसार-परिभ्रमण से भयरूप हैं परिणाम जिनके, उनने पूर्व में किये जो दोष, उनसे उत्पन्न पापकर्म का एकदेश घात करते हैं और जो विशुद्धता बढ जाये तो सर्व पापों का नाश कर देते हैं और मध्यम परिणाम से अल्प या बहुत निर्जरा करते हैं ।

  सदासुखदासजी