तो णच्चा सुत्तविदू णालियधमगो व तस्स परिणामं ।
जावदिएण विसुज्झदि तावदियं देदि जिदकरणो॥631॥
स्वर्णकार-सम सूत्रविज्ञ आचार्य जानकर मुनि के भाव ।
जितने से होती विशुद्धि उतना ही प्रायश्चित्त देते॥631॥
अन्वयार्थ : जैसे नालिका धमन से न्यारा अथवा सुवर्णकार वह जितने ताव में मैेल दूर हो/ निकल जाये, शुद्ध सुवर्ण न्यारा/अलग हो जाये, उतने ताव देकर सुवर्ण को शुद्ध करता है । वैसे ही सूत्र को जाननेवाले और जीते हैं इन्द्रिय-मन जिनने, ऐसे आचार्य भी क्षपक के तीव्रम न्द परिणामों को जानकर जितना प्रायश्चित्त करके परिणाम उज्ज्वल हो जायें और पूर्वकृत कर्म की निर्जरा हो जाये, आगामी पुन: दोष न लगें - ऐसा प्रायश्चित्त देकर शुद्ध करते हैं ।

  सदासुखदासजी