
एवं पवयणसारसुयपारगो सो चरित्तसोधीए ।
पायच्छित्तविदण्हू कुणइ विसुद्धं तयं खवयं॥633॥
वैसे प्रवचनसारभूत-श्रुत पारग1 प्रायश्चित्त ज्ञाता ।
करें विशुद्ध क्षपक को उसकी चारित शुद्धि के द्वारा॥633॥
अन्वयार्थ : जैसे जिसने समस्त आयुर्वेद/वैद्यविद्या जान ली है और चिकित्सा में बुद्धि निपुण है - ऐसा वैद्य, वह रोग की पीडा से व्याकुल या घायल जो रोगी उसे रोगरहित करता है, वैसे ही प्रवचन में सार जो श्रुत का पारगामी और प्रायश्चित्त सूत्र के ज्ञाता जो आचार्य, वे चारित्र की शुद्धता करके क्षपक को शुद्ध करते हैं ।
सदासुखदासजी