सो कदसामाचारी सोज्झं कट्टुं विधिणा गुरुसयासे ।
विहरदि सुविसुद्धप्पा अब्भुज्जदचरणगुणं करवी॥635॥
वह सम्यक् आचारी गुरु से विधिपूर्वक शुद्धि करके ।
चारित में गुण वांछक मुनि सम्यक् विशुद्ध होकर वर्ते॥635॥
अन्वयार्थ : इतने गुणों के धारक आचार्य संघ में न हों तथा उपाध्याय न हों तो स्थविर जो बहुत काल के दीक्षित मुनि तथा गणधर वृषभ/नवीन आचार्य यत्न से प्रवर्तन करने वाले होते हैं और किया है समाचार/मुनियों का सम्यक् आचार जिनने, विशुद्ध है आत्मा जिनका और उदयरूप चारित्र गुण का इच्छुक - ऐसे क्षपक अपनी शुद्धता करने को गुरुओं के निकट विधिपूर्वक प्रवर्तन करते हैं ।

  सदासुखदासजी