
एवं वासारत्ते फासेदूण विविधं तवोकम्मं ।
संथारं पडिवज्जदि हेमंते सुहविहारम्मि॥636॥
नानाविध तप करते-करते वर्षा काल व्यतीत करे ।
सुख विहार हेमन्त ऋतु में संथारा स्वीकार करे॥636॥
अन्वयार्थ : ऐसे वर्षा ऋतु में अनेक प्रकार तप करके और सुखरूप है प्रवृत्ति जिसमें, ऐसे शीतकाल में संन्यास के लिये संस्तर/वसतिका, उसे ग्रहण करते हैं ।
सदासुखदासजी