
सव्वपरियाइयगस्सय पडिक्कमित्तु गुरुणो णिओगेण ।
सव्वं समारुहित्ता गुणसंभारं पविहरिज्ज॥637॥
रत्नत्रय के सब दोषों को गुरु नियोग से कर परिहार ।
गुण समूह को स्वीकृत करके सल्लेखन में करे विहार॥637॥
अन्वयार्थ : सकलपर्याय/पूरी पर्याय/जीवनभर में जो ज्ञान, दर्शन, चारित्र में अतिचार लगे हों, उन्हें गुरुओं के नियोग करि/समागम से दूर करके सम्पूर्ण गुणों को अंगीकार करके प्रवृत्ति करना ।
ऐसे सविचारभक्तप्रत्याख्यान मरण के चालीस अधिकारों में आलोचना के गुणदोष अवलोकन नामक चौबीसवाँ अधिकार अडसठ गाथाओं में पूर्ण किया ।
सदासुखदासजी