
पंचेंदियप्पयारो मणसंखोभकरणो जहिं णत्थि ।
चिठ्ठदि तहिं तिगुत्तो ज्झाणेण सुहप्पवत्तेण॥640॥
मन में क्षोभ करें - एेसे पंचेन्द्रिय विषय जहाँ नहिं हों ।
वहाँ त्रिगुप्ति पूर्वक साधु सुख से रहकर ध्यान करे॥640॥
अन्वयार्थ : जिस वसतिका में मन को क्षोभ करनेवाले पाँच इन्द्रियों के विषयों का प्रचार न हो, उस वसतिका में मन, वचन, काय की गुप्तिपूर्वक सुख से प्रवत~ और धर्मध्यानशु क्लध्यान से सहित तिष्ठें ।
सदासुखदासजी