
उग्गमउप्पादणएसणाविसुद्धाए अकिरियाए हु ।
वसइ असंसत्ताए णिप्पाहुडियाए सेज्जाए॥641॥
उद्गम-उत्पादन-एषण दोषों से रहित अनुद्देशिक ।
प्राणी वास नहीं, संस्कार विहीन वसति में साधु रहे॥641॥
अन्वयार्थ : आपके लिये नहीं बनाई हो, स्वयं ने कहकर याचनादि करके नहीं उत्पादन की/बनवाई न हो । वसतिका के छियालीस दोष पूर्व में कह आये हैं, उनसे रहित हो । लीपना, बुहारना/झाडू लगाना, चूना पुतवाना, धोना, दरवाजे खोलना-उघाडना इत्यादि दोषों से रहित हो और आगन्तुक तथा वास्तव्य/संमूर्च्छन जीवों से रहित हो; जिसमें जीवों के बिल, घोंसला, छत इत्यादि न हों तथा आगन्तुक कीडा-कीडे सर्पादि जीवों की बाधारहित हो, जिसमें प्रतिलेखन से शोधने में कठिनता न हो ।
सदासुखदासजी