पं-सदासुखदासजी
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और कैसी हो, यह कहते हैं -
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सुहणिक्खवणपवेसणघणाओ अवियडअणंधयाराओ ।
दो तिण्णि वि सालाओ घेत्तव्वावो विसालाओ॥642॥
जहाँ सुगम हो आना-जाना, द्वार बन्द हो जहाँ प्रकाश ।
दो या तीन विशाल वसतिका हैं समाधि करने के योग्य॥642॥
सदासुखदासजी