आगंतुघरादीसु वि कडएहिं य चिलिमिलीहिं कायव्वो ।
खवयस्सोच्छागारो धम्मसवणमंडवादी य॥644॥
आगन्तुक या सेना निर्मित गृह, निर्दाेष घास निर्मित गृ
ह में स्थित करें क्षपक को धर्म श्रवण हेतु मंडप॥644॥
अन्वयार्थ : सुखपूर्वक जिसमें से निकलना, प्रवेश करना हो, घना/दृढ हो, जिसका द्वार ढका हो, जिसमें अन्धकार न हो, विस्तीर्ण हो - ऐसी दो, तीन वसतिका ग्रहण करने योग्य हैं और जिसकी दृढ दीवार हो, कपाटसहित हो, ग्राम के बाहर हो, बाल, वृद्ध मुनियों को निकलने, प्रवेश करने योग्य हो, उद्यान/बाग के महल, मकान हों या पर्वतों की गुफा हो, सूना गृह हो, जिसे छोडकर रहनेवाले निकल गये हों, आने-जाने वालों के रहने के लिये हो, वह वसतिका ग्रहण करने योग्य है तथा ऐसी वसतिका का लाभ/प्राप्ति न हो तो क्षपक की स्थिति, रहने के निमित्त तृणादि से धर्मश्रवण मंडपादि करने/बनाने योग्य हैं ।

  सदासुखदासजी