
पुढवीसिलामओ वा फलयमओ तणमओ य संथारो ।
होदि समाधिणिमित्तं उत्तरसिर तहव पुव्वसिरो॥645॥
शुद्ध भूमि, पाषाण शिला या काष्ठ पाट तृणमय संस्तर ।
पूर्व तथा उत्तर दिशि में शिर करके क्षपक समाधि लें॥645॥
अन्वयार्थ : शुद्ध पृथ्वी, पाषाण की शिलारूप, काष्ठ का फलकमय तथा तृणमय - ऐसे समाधिमरण के निमित्त पूर्व दिशा में मस्तक हो तथा उत्तर दिशा में मस्तक हो, ऐसे चार प्रकार के संस्तर कहे, उन्हें ग्रहण करते हैं ।
सदासुखदासजी