
अघसे समे असुसिरे अहिसुअविले य अप्पपाणे य ।
असिणिद्धे घणगुत्ते उज्जोवे भूमिसंथारो॥646॥
समतल और कठोर भूमि हो जन्तु-छिद्र से रहित अनार्द्र ।
तन प्रमाण घनरूप गुप्त भू, युक्त प्रकाश सुसंस्तर योग्य॥646॥
अन्वयार्थ : जो भूमि अघर्ष हो/जिसमें सोने पर खड्डे नहीं पडें, नीची-ऊँची बाधाकार न हो - सम हो, असुषिर/छिद्ररहित हो, अति शुचि हो, बिलादि रहित हो, निर्जन्तु हो, चिक्कणता रहित हो, दृढ हो, गुप्त हो, उद्योतरूप हो, अन्धकाररूप होगी तो संयम नहीं पलेगा - ऐसा भूमिमय संस्तर हो ।
सदासुखदासजी