+ आगे शिलामय संस्तर कहते हैं - -
विद्धत्थो य अफुडिदो णिक्कंपो सव्वदो असंसत्तो ।
समपट्ठो उज्जोवे सिलामओ होदि संथारो॥647॥
घर्षणादि से प्रासुक निश्चल सर्व दिशा में जन्तु न हों ।
निश्चल समतल अरु प्रकाशमय शिलामई यह संस्तर हो॥647॥
अन्वयार्थ : जो शिला अग्निदाह से, टाँचीनि/टाँकनी से, घर्षणादि से विध्वस्त न हो, मर्दित न हो, फूटी न हो, निष्कंप हो, डगमगावे नहीं, सर्व तरफ से जीव रहित हो, जिसका पृष्ठ/ऊपर का भाग समान हो/ऊँचा-नीचा न हो तथा प्रकाशमय हो - ऐसा शिलामय संस्तर होता है ।

  सदासुखदासजी