
भूमिसमरुंदलहुओ अकुडिल एगंगि अप्पपाणो य ।
अच्छिद्दो य अफुडिदो लण्हो वि य फलयसंथारो॥648॥
भू से लगा हुआ, चौड़ा नीचा, सपाट एवं स्थिर ।
छिद्र-जन्तु बिन चिकना एेसा काष्ठ पाट है संस्तर योग्य॥648॥
अन्वयार्थ : भूमि में लगा हो, भूमि से ऊँचा न हो, चौडा विस्तीर्ण हो, लघु/हलका हो, वक्रतारहित/टेडा-मेडा न हो, सरल हो, निष्कंप हो, डगमगाता न हो, अपने शरीर प्रमाण हो, छिद्ररहित हो, फाँटरहित/बीच में फटा या जोड न हो, कोमल हो - ऐसा काष्ठ का फलकमय संस्तर होता है ।
सदासुखदासजी