+ अब तृणमय संस्तर को कहते हैं- -
णिस्संधी य अपोल्लो णिरुवहदो समधिवास्सणिज्जंतु ।
सुहपडिलेहो मउओ तणसंथारो हवे चरिमो॥649॥
तृणमय संस्तर गाँठ रहित हो, टूटे तृण अरु छिद्र न हों ।
मृदु स्पर्शी जन्तु रहित सुखपूर्वक शुद्धि लायक हो॥649॥
अन्वयार्थ : संधिरहित हो, छिद्ररहित हो, जिसका चूर्ण न हो सके - ऐसा निरुपहत हो, कोमल जिसका स्पर्श हो, जन्तुरहित हो, सुख से/आसानीपूर्वक शोधने में आ जाये तथा कोमल हो - ऐसा अन्त्य का तृणमय संस्तर होता है ।

  सदासुखदासजी