
जुत्तो पमाणरइओ उभयकालपडिलेहणासुद्धो ।
विधिविहितो संथारो आरोहव्वो तिगुत्तेण॥650॥
मापयुक्त1 प्रातः सन्ध्या प्रतिलेखन से नित शुद्ध करे ।
विधि सम्मत संस्तर पर साधु तीन गुप्तियुत हो तिष्ठे॥650॥
अन्वयार्थ : योग्य हो, प्रमाणसमन्वित हो, अति अल्प न हो और अति महान भी न हो, प्रात:काल और सूर्य के अस्तकाल में प्रतिलेखन करके शोधने में आ जाये - ऐसा हो और शास्त्रोक्त विधि से रचा हो - ऐसे संस्तर में मन-वचन-काय की गुप्ति सहित आरोहण करना ।
सदासुखदासजी