
णिसिदित्ता अप्पाणं सव्वगुणसमण्णिदंमि णिज्जवए ।
संथारम्मि णिसण्णो विहरदि सल्लेहणा विधिणा॥651॥
सर्वगुणों से भूषित गुरु-चरणों में आत्म-समर्पण कर ।
सल्लेखना विधि से विचरे संस्तर पर आरोहण कर॥651॥
अन्वयार्थ : सकल गुणों से सहित जो निर्यापकाचार्य, उनकी शरण में आत्मा को स्थापित करके सल्लेखना करने में उद्यमी क्षपक संस्तर में तिष्ठता/रहकर विधिपूर्वक शरीर सल्लेखना और कषाय सल्लेखना में प्रवृत्ति करें ।
इति सविचारभक्तप्रत्याख्यानमरण के चालीस अधिकारों में संस्तर नामक छब्बीसवाँ अधिकार सात गाथाओं में पूर्ण किया ।
सदासुखदासजी