पं-सदासुखदासजी
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अब निर्यापक नामक सत्ताईसवाँ अधिकार ब्यालीस गाथाओं में कहते हैं -
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पियधम्मा दढधम्मा संवेगावज्जभीरुणो धीरा ।
छंदण्हू पच्चइया पच्चक्खाणम्मि य विदण्हू॥652॥
जिन्हें धर्मप्रिय, जो धर्म स्थिर, पाप और जग से भयभीत ।
अभिप्रायज्ञ, धीर, क्रम-प्रत्याख्यान1 जानते निर्यापक॥652॥
सदासुखदासजी