
कप्पाकप्पे कुसला समाधिकरणुज्जदा सुदरहस्सा ।
गीदत्था भयवंता अडदालीसं तु णिज्जवया॥653॥
योग्य-अयोग्य कुशल अरु चित के समाधान में तत्पर हैं ।
सूत्रार्थ अरु श्रुत रहस्य ज्ञाता अड़तालिस निर्यापक॥653॥
अन्वयार्थ : क्षपक की धर्म में रुचि दृढ कैसे करायेंगे? दृढधर्मा/धर्म में स्थिर हों, जो चारित्र में दृढ नहीं होंगे, वे क्षपक का संयम बिगाड देंगे । जिनका परिणाम पंचपरिवर्तनरूप संसार के चिंतवन से संसारपरिभ्रमण से भयवान हो, परीषह के सहने में समर्थ इसलिए धीर हैं । जो परीषह सहने में असमर्थ हों, वे संयम का निर्वाह करने में समर्थ नहीं होते तथा क्षपक के कहे बिना ही अंगों की चेष्टा से उनके अभिप्राय को जानने में समर्थ हों । जो प्रतीति के योग्य हों, देवकृत उपसर्गादि में भी जिनका परिणाम चलायमान न हो, प्रत्याख्यान/त्याग के मार्ग का क्रम जाननेवाले हों, इस देश में इस काल में यह योग्य है, यह अयोग्य है - ऐसे भोजन-पान, गमनआगम न इत्यादिक में योग्य-अयोग्य को जाननेवाले हों, क्षपक के चित्त की सावधानी करने में उद्यमी हों, श्रवण किये हैं प्रायश्चित्त ग्रन्थ जिनने, ऐसे होंऔर अनेकांतरूप जिनेन्द्र के आगम गुरुओं के प्रसाद से अच्छी तरह अनुभव करकेे आत्मतत्त्व-परतत्त्व को जाननेवाले हों, अपना और पर का उद्धार करने में समर्थ हों - ऐसे अडतालीस मुनि निर्यापकगुण के धारक क्षपक के उपकार करने में सावधान रहते हैं ।
सदासुखदासजी