+ अब अडतालीस मुनि कैसे-कैसे/क्या-क्या उपकार करते हैं, यह कहते हैं- -
आमासणपरिमासणचंकमणासयण णिसीदणे ठाणे ।
उव्वत्तणपरियत्तणपसारणा उंटणादीसु॥654॥
करें क्षपक का स्पर्शन, मर्दन, निज कर से सहलायें ।
आने-जाने, उठते सोने करवट आदिक में मदद करें॥654॥

  सदासुखदासजी