संजदकमेण खवयस्स देहकिरियासु णिच्चमाउत्ता ।
चदुरो समाधिकामा ओलग्गंता पडिचरंति॥655॥
शारीरिक कायाब में प्रतिदिन लगे रहें परिचालक चार ।
करें समाधि-कामना एवं परिचर्या आगम अनुसार॥655॥
अन्वयार्थ : शरीर का हाथों से स्पर्शन/दबाना, उसे परिमर्शन कहते हैं । ऐठी ऊठी/नीचे से ऊपर तक गमन/ दबाना, उसे चंक्रमण कहते हैं । शयन/सोना, निषद्या/बैठना, स्थान/खडे रहना, उद्वर्तन/ करवट लेना, परिवर्तन/पलटना, प्रसारण/हाथ-पैर आदि पसारना, आकुंचन/समेटना इत्यादि क्षपक की देह की क्रिया - इनमें 'जैसे संयम नष्ट नहीं हो, वैसे' संयम का क्रमपूर्वक नित्य ही उद्यमयुक्त और क्षपक को समाधान/सावधान करने के इच्छुक ऐसे चार मुनि उपासना/ सेवा करते हुए प्रतिचारक/टहल करनेवाले होते हैं ।

  सदासुखदासजी