पं-सदासुखदासजी
अखलिदममिडिदमव्वाइठ्ठमणुच्चमविलंविदममंदं ।
कंतममिच्छामेलिदमणत्थहीणं अपुणरुत्तं॥657॥
कहें अस्खलित धर्मकथा अविरुद्ध और सन्देह विहीन ।
मोह रहित अरु सार्थक वार्ता मन्द-तीव्र-पुनरुक्ति विहीन॥657॥
सदासुखदासजी